सरस्वती पूजा क्यों मनाया जाता हैं? जाने। किसके कारण सरस्वती पूजा मनाते है।

 सरस्वती पूजा क्यों मनाया जाता हैं? जाने। किसके कारण सरस्वती पूजा मनाते है।

         

            


दोस्तों मुझे बहुत ही अच्छा लगा कि आप मेरे ब्लॉग पर आकर आज सरस्वती पूजा क्यों मनाते हैं उसके बारे में जानकारी प्राप्त किया।


वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्यौहार है। इस  दिन विद्या कि देवी सरस्वती की पूजा कि जाती है।

यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बंगला देश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े ही उत्साह के साथ मनाई जाती है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुरानों-शास्त्रो तथा अनेक काव्यग्रंथों

में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।


प्राचीन भारत और नेपाल में पुरे साल को जिन छह मौसमों में बांटा जाता था। उनमें बसंत ऋतु लोगों का मनचाहा मौसम था। जब फुलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का फुल मानो सोना चमकने लगता, जौं और गेहूं कि बालियां खिलने लगती, आमों के पेड़ पर मांजर (बौर) आ जाता और हर तरफ रंग- बिरंगी तितलियां मंडराने लगती। भर- भर भंवरे भंवराने लगते। बसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने में एक बड़ा जश्न मनाया जाता है। जिसमें बिष्णु और कामदेव कि पूजा होती है। यह बसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता है।



        बसंत पंचमी का कथा


उपनिषदों कि कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान शिव कि आज्ञा से भगवान ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि कि रचना की। लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है।


हालांकि उपनिषद या पुराण ऋषियों को अपना- अपना अनुभव है, अगर यह हमारे पवित्र सत ग्रंथों से मेल नहीं खाता तो यह मान्य नहीं है।


तब ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने हथेली पर लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान श्री विष्णु कि स्तुति करनी आरंभ की। ब्रम्हा जी के किए स्तुति को सुनकर

भगवान बिष्णु तत्काल ही उनके सम्मुख प्रकट हो गए और उनकी समस्या जानकर भगवान बिष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आव्हान किया। बिष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण भगवती दुर्गा वहां तुरंत ही प्रकट हो गई। तब ब्रह्मा एवं बिष्णु जी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया।


ब्रम्हा जी तथा बिष्णु जी कि बातों को सुनने के बाद उसी क्षण माता दुर्गा के शरीर से स्वेत रंग का एक भारी तेज उत्पन्न हुआ जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था। जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में वर मुद्रा था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा का मधुरनाद किया। जिससे संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई।

जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को वाणी कि अधिष्ठात्री देवी " सरस्वती" कहा।


         


फिर आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रह्मा जी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी। जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु कि शक्ति है, पार्वती महादेव शिव कि शक्ति है उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति श्री दुर्गा सब देवताओं को देखते-देखते वहीं अंतर्धान हो गई। इसके बाद सभी देवता गण सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।



 माता सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादन और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पुजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता है। संगीत कि उत्त्पति करने के कारण ये संगीत कि देवी भी है। बसंत पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-


प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।


अर्थात ये परम चेतना है। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों कि संरक्षिका है। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही है। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना कि जाएगी और तभी से इस वरदान के फलस्वरूप भारत देश में बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।


            पर्व का महत्व


बसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु- पक्षी  तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नई उमंग से सुर्योदय होता है और नई चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।


यूं तो माघ का पुरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर बसंत पंचमी (माघ शुक्ल) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है।

प्राचीन काल से इसे ज्ञान और कला कि देवी मां सरस्वती का जन्म दिवस मनाया जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वो इस दिन मां शारदे कि पुजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने कि प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शास्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वहीं महत्व कलाकारों के लिए बसंत पंचमी का है। चाहे वो कवि हो या लेखक, गायक हो या वादक, नाटककार हो या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों कि पूजा और मां सरस्वती कि वंदना से करते हैं।


तो दोस्तों आपलोगों को पता ही होगा कि आज कल सभी जगहों पर बसंत पंचमी मे सरस्वती पूजा मनाया जाने लगा।


दोस्तों माता सरस्वती विद्या कि देवी मानी जाती है। और खास कर यह पूजा पहले विद्यालयों में मनाया जाता था लेकिन अब बहुत सारे जगहों पर भी सरस्वती पूजा मनाया जाने लगा और बहुत ही धुम धाम से मनाया जाता है।


तो दोस्तों अगर आप भी सरस्वती पूजा मनाते हैं तो एक बार जरूर जान लें कि सरस्वती पूजा क्यों मनाया जाता है और किसलिए मनाया जाता है। क्योंकि कि अगर आपसे कोई सवाल कर देगा कि सरस्वती पूजा क्यों मनाया जाता है और क्यों मनाया जाता है तो आप जवाब नहीं दे पाएंगे। इसलिए आपलोगों को ये बता दूं कि मेरे इस ब्लॉग पर आकर सारी जानकारी प्राप्त कर लें।

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